श्वेताश्वतर- उपनिषद | Shwetashwatar-Upanishad

- श्रेणी: उपनिषद/ upnishad संस्कृत /sanskrit
- लेखक: महेशानंद गिरी - Maheshanand Giri
- पृष्ठ : 544
- साइज: 35 MB
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दो शब्द :
इस पाठ में श्वेताश्वतर उपनिषद् के महत्व और उसके अध्ययन की कठिनाइयों पर चर्चा की गई है। उपनिषदों में श्वेताश्वतर उपनिषद् को एक विशेष स्थान दिया गया है, और इसे कृष्ण यजुर्वेद की एक शाखा माना गया है। इस शाखा के अन्य ग्रंथों का अभाव होने के कारण, केवल श्वेताश्वतर उपनिषद् ही उपलब्ध है, जिससे यह समझना कठिन हो जाता है कि अन्य उपनिषदों में इसके विचार कैसे प्रस्तुत किए गए होंगे। पाठ में यह भी बताया गया है कि वेदों में शिव की उपासना का उल्लेख मिलता है और यह दर्शाया गया है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में शिव की पूजा कितनी महत्वपूर्ण रही है। पुरातात्विक प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि शिव की उपासना हजारों वर्षों से चली आ रही है और विभिन्न संस्कृतियों में इसका प्रभाव रहा है। शैव धर्म और उसके विभिन्न सम्प्रदायों का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें बताया गया है कि शैव परंपरा में भक्ति और ज्ञान का समन्वय होता है। पाठ में यह भी कहा गया है कि श्वेताश्वतर उपनिषद् में जो विचार प्रस्तुत किए गए हैं, वे अद्वितीय हैं और इसमें ब्रह्म और आत्मा के बीच के संबंध को समझाने की कोशिश की गई है। अंत में, यह बताया गया है कि श्वेताश्वतर उपनिषद् का अध्ययन केवल व्यक्तिगत दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि समग्र वैदिक साहित्य के संदर्भ में किया जाना चाहिए, जिससे इसके गहन अर्थों और दर्शन को समझा जा सके। पाठ में उपनिषदों और वेदों के बीच के संबंधों को भी स्पष्ट किया गया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि श्वेताश्वतर उपनिषद् वेदांत का एक महत्वपूर्ण अंग है।
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